Tuesday, November 24, 2009

वो मर गया



वो मर गया 





उसकी विस्मित नज़रें मेरी तरफ कुछ ऐसे देख ररही थी की जैसे मैंने कोई जघन्य अपराध कर दिया हो, या जैसे की उसकी दुनिया ही उजाड़ दी हो.


मैं उसकी नज़रों को देख कुछ असहज सा मह्ससूस करने लगा, इसकी वजह शायद उसकी आँखों में मौजूद वो भोलापन था. यह भोलापन अपने आप में एक शुन्यता लिए हुई थी. यह शुन्यता मुझे कुछ ऐसा बोझ दे रही थी की मुझे अपने आप में डुबो देगी.


मै  उससे ज्यादा देर नज़रे नहीं मिला पाया और उसके चेहरे से  अपना ध्यान हटते हुए उसके हुलिए को देखने लगा.
मैंने देखा की उसके हाथ में एक कुछ था जो एक भद्दे से चूज़े  जैसा कुछ था.


  वो एकदम तपाक से बोल पड़ा " वो मर गया" . यह बोलते समय उसकी आवाज़ में अलग सा भारीपन था, लेकिन इसके बाद वह चुप होकर मेरी तरफ देखने लगा.


मैं उसकी वेदना को देख कर समझ गया की उसके किसी सगे सम्बन्धी की मौत हो गयो है. मैंने उससे पुचा :" भाई किसकी मौत हो गयी है" ?


वो चुप था, मई अपनी  ज़िम्मेदारी निभा चूका था, तब भी वह चुप था, यह खामोशी मुझे भीतर ही भीतर खा रही थी. उसका चेहरा देख कर भी नहीं लग रहा था की वो कुछ जल्दी बोलेगा.


मैं इस खामोशी को सह नहीं पाया और बोल पड़ा " भाई किनकी मृत्यु हो गयी है"?


उसने अपना चेहरा अन्दर खीचते हुए और होंट अन्दर दबाते  अपनी हथेली की तरफ गर्दन से इशारा करते हुए बोला  " यह मर गया" .


मैंने उसकी हथेली की तरफ अपनी आँखे गडाते हुए ध्यान से देखा तो पाया की उसकी हथेली में एक चूज़ा  ही था. 
उसने उस चूज़े को अपनी हथेली में कुछ ऐसे रखा था जैसे प्रातः कोई ब्राम्हण सूर्य को जल तर्पण करते समय अपनी अंजुली में लेता है. 

मैंने उस चूज़े की तरफ ध्यान से देखा तो पाया की वो एक काले रंग का एक भद्दा सा चूज़ा था, जिस पर कुछ सफ़ेद से धब्बे या दाग थे, मुझे लगा की ये दाग किसी बीमारी के है. 



मेरा मुर्गे और मुर्गियों के मामले में ज्ञान कुछ कम था, तो मई उसकी नस्ल के बारे में कुछ नहीं जनता था. 


फिर भी इस व्यक्ति का उस चूज़े की  मौत पर अफ़सोस देखकर मैंने अंदाज़ा लगा लिया की ज़रूर यह चूज़ा किसी दुर्लभ और महँगी नस्ल का रहा होगा. 


हम दोनों के बीच में फिर ख़ामोशी च चुकी थी. मई फिर अपने अन्दर के खोखलेपनको बर्दाश्त नहीं कर पाया और अपने इसी अंदाज़े के आधार पर कह बैठा की " हाँ इस नस्ल के चुज़े आजकल इतनी आसानी से मिलते कहाँ है? "


मेरी ये बात ख़त्म होते ही, उसने पहले मृत चुज़े की तरफ देखा और फिट मेरी तरफ कुछ ऐसे देखा जैसे मैंने उस मृत चुज़े को कोई गली दे दी हो.


फिर वह सपाट लहज़े   में बोला " नहीं इसके जैसे तो कई चुज़े है"


मैंने खुद को कोसा की क्यों मैंने अपना अधूरा ज्ञान एक गंवार के सामने रखा. फिर मई बोला " फिर क्या बात है भाई, चुज़े तो होते ही हलाल होने के लिए है" 


यह बोलते ही मुझे अफ़सोस हुआ की यह मई क्या बोल गया.


मुझे लगा की उसे मेरी यह बात कोई खास बुरी नहीं लगी. 


वो बोला की कुछ ही दिन पहले तो बेचारा अपनी सफ़ेद, बेरंग अंडे की दुनिया से बहार आया था, अभी अभी तो उसने बाहर की रंग -बीरंगी  दुनिया देखि थी. 


मुझे बहुत अजीब सा लगा, मैंने बात बदलते हुए उससे पूछ लिया, " यह हुआ कैसे? " 
उस चुज़े के शरीर पर घाव के कई निशान थे. 
वह चुप रहा, उसकी आँखें देखकर लग रहा था की उसकी आँखों में कोई भयावह सा सीन चल रहा हो. 


वो बोला आज सुबह ही तो बेचारा घूम रहा था और इधर उधर खेल रहा था. इसे भी क्या पता था......इतना कहते कहते वह चुप हो गया. 


मई उसकी ख़ामोशी के बोझ में फिर दबाने लगा, और जैसे चाय की दुकान पर सुबह अखबार की headline पे चर्चा  होती है, उसी तरह मैंने उससे पूछ लिया , " सुबह क्या हुआ?" 


मेरे इस प्रश्न में एक अजीब से झल्लाहट थी. 


वह बोला सुबह एक कौए की नज़र इस मासूम  पर पद गई, नासपीटा इस पर ऐसे झपटा, मई इसे बचाने के लिए दौड़ा लेकिन कौआ उसे अपनी अधूरी पकड़ में दबाए हुए उड़ गया. कौआ उड़कर पेड़ तक पहुंचा ही था की  ये उसकी अधूरी पकड़ से ये फिसल कर ज़मीन पर आ गिरा. 


मै इसे बचाने के लिए फिर दौड़ा ही था की दो कुत्तों की नज़र इस पर पड़ गई, वो दोनों इस गरीब पर कुछ  ऐसे झपटे जैसे साक्षात् यमराज ने उन्हें भेजा हो. दोनों कुत्तों में से एक ने इस पर पंजा मारा ही था की मैंने उन्हें पत्थर मार के भगाया. 


मै इस के पास गया तो पाया की इस नन्ही सी जान पर कई चोटें आई थी. 
यह कहते कहते वो रुक गया. उसका चेहरा एकदम रुआंसा हो गया. 


मै आगे कुछ नहीं पूछ पाया. 


कुछ देर के बाद वो बोला " उसकी साँसे तेज़ी से थी, मैंने उसको अपनी हथेली में ले के पानी पिलाया" .


वह आगे बोला, " बाबूजी पानी पीने के बाद इस चुज़े ने मेरी तरफ कुछ ऐसे देखा  जैसे बोल रहा हो, " मिल गयी उस कौए, इन कुत्तों और तुम सबको तसल्ली, अब मै जा रहा हूँ, तुम सब खुश होलो, ऐसे नहीं तो हलाल करके किसी न किसी तरह तो मुझे मरना ही था. 


इस गरीब को न तो उसकी मर्ज़ी की ज़िन्दगी मिली , ना ही उसकी मेजी की मौत. 


वो मर गया बाबूजी, वो मर गया.
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3 comments:

मनोज कुमार said...

अच्छी रचना। बधाई। ब्लॉगजगत में स्वागत।

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

alka sarwat said...

इश्वर दोनों की आत्मा को शांन्ति दे दे